कृष्ण
कृष्ण कृष्ण जय कृष्ण कृष्ण....
मेरे सावरियाँ सरकार की जय हो.....
मेरे मोहना तेरी छबि निहारु ।
तुझे अंखियो में उतारू।
हे मोर मुकुट बंसी वाले में बलि बलि जाऊ ।
तेरी सुरतिया मोहे मन भाई जग में और कहा में जाऊ ।
तू तो ठहरो नन्द को लाला इन अंखियो का तारा ।
गोपियो के संग रास रचाके यमुना तट पर बंसी बजाये बो नन्द को लाला।
हे मनमोहन ,हे श्याममुरारी..तुम्हे बारंबार प्रणाम।
तुझसे दिल लगा बैठी हूँ,
हे गिरीधारी ,मैं अपना चैन गवां बैठी हूँ,
जानती हूँ कि काबिल नहीं हूँ मैं फिर भी मिलन की आस
लगा बैठी हूँ,
चाहने वाले हैं तेरे लाखों पर मेरा इक तू ही हैं,
तेरेलिए ही सर्वस्व लुटा बैठी हूँ।
बांवरी हो तुझ को ढूंढती हूँ
हर साँस मेरी कृष्ण नाम की माला जपती , तेरे दीदार के लिये
अँखियाँ थका बैठी हूँ।
हे मुकूंद मुरारी श्याम,तेरी मुरली सुनकर जमूना की बहती धारा थम जाती हैं।गोपीया तन मन धन भूल जाती हैं।पंछी उडना भूल जाते है।गय्या चरना भूल जाती हैं।
हे श्याम, तूम गोकूल,मथूरा,काशी में हो ये सब जानते हैं लेकिन तूम मेरी अंतरआत्मा में बसते हो ये बात तो सिर्फ मैं जानू या तूम ही जानो...
हे सावरे,तुमरी एक छबी के दर्शन के लिये मीरा तरसती हैं।
तुम्हे पाऊँ तो सब संसार मेरा हो जाता हैं।और तूम से क्षणभर के लिये भी भूल जाऊ तो जीवन समाप्त हो जाता हैं..
तुम संग प्रीत बढी और ये मीरा मीरा न रही ये तो कृष्ण बन गयी।
तुम्हारी बन गयी...मेरे प्यारे बस हमें भूल न जाना।तुमरी प्रिया को कभी न तरसाना।तुमरा दर्शन ही जीवन हैं।तुमरी प्यास ही मेरा धरम हैं,मेरा करम हैं।
हर साँस मेरी कान्हा तुमरा नाम जपती रहे और एक दीन मैं तुममें समाँ जाऊ बस्स यही चाहत हैं और कूछ नही।...
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